क्या सचमुच भालू ने आत्महत्या की, या हमने उसका घर छीन लिया - राजेश्वर पाण्डेय

क्या सचमुच भालू ने आत्महत्या की, या हमने उसका घर छीन लिया -  राजेश्वर पाण्डेय 
संपादक -मनहरण कश्यप Gs news 

वि खं कोटा के ग्राम पंचायत डाडबछाली के सुखनाला में एक वृद्ध भालू का शव मिला। यह घटना केवल एक वन्यजीव की मृत्यु नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बिगड़ते रिश्ते का दर्दनाक संकेत है।
कल्पना कीजिए, यदि वह भालू बोल पाता तो शायद कहता—
"मैं तो जंगल का वासी था। लेकिन धीरे-धीरे मेरे जंगल कटते गए, पेड़ गायब होते गए और उनकी जगह इंसानों के घर, सड़कें और बस्तियाँ बसती चली गईं। जंगल सिमटते गए, भोजन और पानी के स्रोत खत्म होते गए। आखिर मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ?"
आज अक्सर भालू, हाथी, तेंदुए और अन्य वन्यजीव गांवों की गलियों में दिखाई देते हैं। कई लोग इसे उनका 'आतंक' मानते हैं, लेकिन शायद यह उनका नहीं, बल्कि हमारे द्वारा उनके प्राकृतिक आवास में किए गए अतिक्रमण का परिणाम है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि भालू ने आत्महत्या की, क्योंकि इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि जंगलों का लगातार विनाश, प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना और पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता वन्यजीवों को ऐसे संकट में धकेल रही है, जहां उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।
डाडबछाली की यह घटना हमें एक गंभीर सवाल पूछने पर मजबूर करती है—यदि जंगल नहीं बचेंगे तो वन्यजीव कहां जाएंगे? और जब उनका घर ही नहीं बचेगा, तो इंसान और वन्यजीवों के बीच संघर्ष कैसे रुकेगा?
आज आवश्यकता केवल शोक व्यक्त करने की नहीं, बल्कि जंगलों के संरक्षण, अवैध कटाई पर रोक और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की है। क्योंकि यदि हमने समय रहते प्रकृति को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में ही इन वन्यजीवों को देख पाएंगी।
डाडबछाली का यह मौन भालू शायद हमें यही संदेश देकर गया है—
"जंगल बचाइए, तभी जीवन बचेगा।"

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