कला से भावनात्मक बुद्धिमत्ता सीख रहे बच्चे : स्पिकमेके द्वारा आयोजित सत्रिय नृत्य कार्यशाला एवं प्रस्तुति

कला से भावनात्मक बुद्धिमत्ता सीख रहे बच्चे : 
स्पिकमेके द्वारा आयोजित सत्रिय नृत्य कार्यशाला एवं प्रस्तुति
संपादक -मनहरण कश्यप 

बिलासपुर/आधारशिला विद्या मंदिर न्यू सैनिक स्कूल में स्पिकमेके द्वारा असम के सत्रिय नृत्य पर एक प्रेरणादायक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम के लिए असम से चार कलाकारों का आगमन हुआ | सभी कलाकार अपने-अपने क्षेत्र में बहुत खास अनुभव लेकर यह कार्य कर रहे हैं |  सुश्री उषा रानी वैश्य उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार से सम्मानित हैं। वे संस्कृति मंत्रालय की वरिष्ठ शोध फेलो, प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय, गुवाहाटी के प्रदर्शन कला विभाग की संकाय सदस्य तथा दूरदर्शन, नई दिल्ली की ‘ए’ ग्रेड कलाकार हैं। श्री उपेन बरगायन (स्वर) बचपन से ही मठ में रहकर संगीत एवं साधना का अभ्यास कर रहे हैं | उनके साथ संगत कलाकारों में श्री कृष्णकांत दास (खोल),  तथा डॉ. जादव बोरा (ताल) उपस्थित रहे, जिनके उत्कृष्ट संगीत ने प्रत्येक प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के अध्यक्ष डॉ. अजय श्रीवास्तव, निदेशक श्री एस. के. जनास्वामी तथा प्राचार्या श्रीमती जी. आर. मधुलिका द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर असम की सुप्रसिद्ध सत्रिय नृत्यांगना एवं कोरियोग्राफर सुश्री उषा रानी वैश्य ने अपनी मनमोहक वंदना  से कार्यक्रम को आगे बढाया । उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वंदना की सौम्यता, आध्यात्मिकता और लयात्मकता ने वातावरण में शांति, ताजगी और नई ऊर्जा का संचार किया तथा कार्यक्रम के भाव एवं उद्देश्य की सुंदर भूमिका प्रस्तुत की।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को सत्रिय नृत्य की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराया गया। सत्रिय भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति असम के वैष्णव मठों (सत्रों) में हुई। पंद्रहवीं शताब्दी में महान संत, समाज-सुधारक एवं विद्वान श्रीमंत शंकरदेव द्वारा विकसित इस नृत्य शैली में भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान विष्णु के विविध अवतारों से संबंधित भक्तिमय कथाओं का अभिनय, संगीत और नृत्य के माध्यम से अत्यंत सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि सुश्री उषा रानी वैश्य ने केवल प्रस्तुति ही नहीं दी, बल्कि विद्यार्थियों को संवादात्मक शैली में सत्रिय नृत्य की व्याकरण से भी परिचित कराया। वे विभिन्न मुद्राओं, हस्तभंगिमाओं एवं गतियों का संक्षिप्त प्रदर्शन करतीं और विद्यार्थियों से उनके अर्थ एवं भाव का अनुमान लगाने के लिए कहतीं। इसके माध्यम से विद्यार्थियों ने समझा कि किस प्रकार प्रत्येक मुद्रा, चरण संचालन, नेत्राभिनय तथा अंग-संचालन का अपना विशिष्ट नाम, उद्देश्य और सौंदर्यशास्त्रीय महत्व होता है। उन्होंने यह भी बताया कि अनेक मुद्राओं एवं गतियों के नाम प्रकृति, पशु-पक्षियों, दैनंदिन जीवन तथा पौराणिक प्रसंगों से प्रेरित हैं, जिससे नृत्य केवल शारीरिक अभिव्यक्ति न रहकर अर्थपूर्ण सांस्कृतिक भाषा बन जाता है।

इसके पश्चात उन्होंने भारतीय परंपरा में वर्णित चौंसठ कलाओं (६४ कलाओं) का परिचय देते हुए उनके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यार्थियों को यह समझाया कि भारतीय शिक्षा परंपरा में कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार मानी जाती थी।

कार्यक्रम का एक अत्यंत रोचक एवं प्रभावशाली भाग नवरसों की प्रस्तुति रहा। सुश्री उषा रानी वैश्य ने अभिनय, मुखाभिनय और संवाद के माध्यम से श्रृंगार, वीर, अद्भुत, शांत, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक तथा वीभत्स रसों का सजीव प्रदर्शन किया। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन केवल सुखद भावनाओं तक सीमित नहीं है; रौद्र, भयानक और वीभत्स जैसे रस भी उचित समय पर साहस, सतर्कता, आत्मरक्षा, अन्याय के प्रतिरोध तथा नैतिक निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक रस जीवन की भावनात्मक परिपक्वता का एक आवश्यक पक्ष है।
पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने अत्यंत उत्साह और एकाग्रता के साथ सहभागिता की। संवाद, प्रस्तुतियों और चर्चाओं के माध्यम से उन्हें ध्यानपूर्वक सुनने, सूक्ष्म अवलोकन करने, कला-बोध एवं सौंदर्य-बोध विकसित करने, भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ने तथा नवरसों के माध्यम से इमोशनल इंटेलिजेंस को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति न होकर भारतीय ज्ञान परंपरा, सौंदर्यशास्त्र और जीवन मूल्यों से जुड़ने का एक सजीव शिक्षण अनुभव सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम के समापन पर विद्यालय प्रबंधन एवं नेतृत्व टीम द्वारा सभी अतिथि कलाकारों का सम्मानपूर्वक अभिनंदन एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर अभिनंदन किया गया। विद्यालय के अध्यक्ष डॉ. अजय श्रीवास्तव ने कलाकारों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय शास्त्रीय कलाएँ केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के विकास का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने स्पिकमेके एवं कलाकारों का आभार व्यक्त करते हुए आशा व्यक्त की कि ऐसे प्रेरणादायक कार्यक्रम भविष्य में भी विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते रहेंगे

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