जिंदगी बचाने में पीछे, मौत के बाद संवेदनाओं की भीड़!आखिर यह कैसी इंसानियत, जहां मदद से ज्यादा दिखावे को मिल रहा महत्व?

जिंदगी बचाने में पीछे, मौत के बाद संवेदनाओं की भीड़!आखिर यह कैसी इंसानियत, जहां मदद से ज्यादा दिखावे को मिल रहा महत्व?
✍️ विशेष लेख — मनहरण कश्यप

इंसानियत का असली अर्थ किसी के दुख में उसके साथ खड़े होना और संकट के समय उसका सहारा बनना है। लेकिन आज समाज में एक ऐसी विडंबना देखने को मिलती है, जो मन को भीतर तक झकझोर देती है।
जब कोई गरीब और असहाय व्यक्ति गंभीर बीमारी से जूझ रहा होता है, जब उसके परिजन इलाज के लिए दर-दर भटकते हैं और अपनों की जिंदगी बचाने के लिए लोगों से मदद की गुहार लगाते हैं, तब अक्सर उनकी पुकार अनसुनी कर दी जाती है। उस समय जरूरतमंद परिवार को आर्थिक सहयोग, सहानुभूति और संबल की जरूरत होती है, लेकिन मदद के लिए बहुत कम हाथ आगे आते हैं।
दुर्भाग्य देखिए, जब वही इंसान जिंदगी की जंग हार जाता है, तब उसके घर संवेदना व्यक्त करने वालों की भीड़ उमड़ने लगती है। कुछ लोग आर्थिक सहयोग देते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर वाहवाही बटोरते हैं।
निस्संदेह, मृत्यु के बाद शोकाकुल परिवार को सांत्वना देना और आर्थिक मदद करना भी नेक कार्य है। लेकिन सवाल यह है कि जब वह इंसान जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था, तब यही संवेदनाएं कहां थीं? क्या किसी की जिंदगी बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण मौत के बाद अपनी छवि चमकाना हो गया है?
किसी जरूरतमंद की मदद के लिए बड़ी रकम होना जरूरी नहीं। छोटी-सी आर्थिक सहायता, दवा का इंतजाम, रक्तदान या इलाज के लिए लोगों को जोड़ने का प्रयास भी किसी परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बन सकता है। हम किसी की जिंदगी बचाने की गारंटी नहीं दे सकते, लेकिन समय पर सहयोग करके उसके संघर्ष में सहभागी जरूर बन सकते हैं।
समाजसेवा का उद्देश्य प्रसिद्धि पाना नहीं, बल्कि किसी के दुख को कम करना होना चाहिए। तस्वीरें साझा करना गलत नहीं, लेकिन जब प्रचार सेवा की भावना पर हावी हो जाए, तब आत्ममंथन जरूरी है।
याद रखिए, मृत व्यक्ति को हमारी सहायता की जरूरत नहीं रह जाती, लेकिन जिंदगी से जूझ रहे इंसान के लिए हमारा छोटा-सा सहयोग भी उम्मीद की किरण बन सकता है।
आइए, ऐसा समाज बनाएं जहां किसी गरीब को इलाज के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े। किसी की मौत के बाद श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ, उसकी जिंदगी बचाने के लिए भी समय रहते हाथ बढ़ाएं।
“मौत के बाद संवेदना जताने से बड़ी बात है, किसी की सांसें बचाने के लिए वक्त रहते उसका सहारा बन जाना। क्योंकि इंसानियत की असली परीक्षा किसी के जाने के बाद नहीं, बल्कि उसके संघर्ष के दौरान होती है।”
✍️ मनहरण कश्यप
संपादक — GuruShishya News CG
सामाजिक सरोकार एवं जनहित में विशेष लेख

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